भारत की सौर ऊर्जा यात्रा उसे दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा में अग्रणी के तौर पर उभरने में मदद कर रही है। गुरुग्राम में इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आईएसए) मुख्यालय के संस्थापक सदस्य और मेजबान के तौर पर, भारत ने 125 से ज्यादा सदस्य देशों में सौर ऊर्जा सुविधाएं विकसित करने, वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में मदद की है। अक्टूबर 2025 में, भारत ने नई दिल्ली में 8वीं आईएसए असेंबली की मेजबानी की, जिसमें दुनिया भर के मंत्री और प्रतिनिधिमंडल एक साथ आए ताकि मजबूत सौर मूल्य श्रृंखला, समावेशी पहुंच और सौर ऊर्जा को तेजी से अपनाने की रणनीति को आगे बढ़ाया जा सके।
पिछले दस सालों में सौर ऊर्जा इंस्टॉलेशन में बढ़ोतरी ने भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता को दोगुना करने में अहम भूमिका निभाई है। वर्तमान में, सौर क्षमता 129 जीडब्ल्यू है, जबकि गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता 259 जीडब्ल्यू को पार कर गई है, जो अक्टूबर 2025 तक देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता की 50% से ज्यादा है। यह निम्न-कार्बन ऊर्जा की ओर एक ऐतिहासिक बदलाव है।
तेजी से घरेलू इस्तेमाल को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़कर, भारत एक मजबूत, टिकाऊ और सोलर-आधारित ऊर्जा भविष्य की नींव रख रहा है जो दुनिया के लिए बेंचमार्क स्थापित करेगा।
हरित बदलाव (ग्रीन ट्रांजिशन) को आगे बढ़ाना: पंचामृत फ्रेमवर्क के तहत भारत का रोडमैप
नवीकरण ऊर्जा के विस्तार में तेजी न सिर्फ बाजार की वृद्धि पर आधारित है, बल्कि एक मजबूत नीति और रणनीतिक ढांचे से भी इसे समर्थन मिल रहा है। ग्लासगो (नवंबर 2021) में सीओपी26 में पंचामृत घोषणाओं के तहत बताए गए राष्ट्रीय लक्ष्य और वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धता, एक सतत ऊर्जा भविष्य के लिए एक साफ रोडमैप देते हैं।
पंचामृत फ्रेमवर्क के पांच मुख्य हिस्से इस प्रकार हैं:
- 2030 तक 500जीडब्ल्यू गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित स्थापित बिजली क्षमता– इसमें सौर, पवन, बायोमास, पनबिजली और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं, इस लक्ष्य का मकसद भारत के बिजली मिश्रण में स्वच्छ ऊर्जा का हिस्सा काफी बढ़ाना है।
- 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोत से स्थापिच बिजली क्षता का 50% हिस्सा – ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाने और जीवाश्व ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए तैयार किया गया है।
- 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कमी – यह स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर क्षक्षता उपायों के जरिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है।
- 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (इंटेंसिटी) में 45% की कमी (2005 के लेवल की तुलना में) – ऊर्जा दक्षती, निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकी और सतत औद्योगिक अभ्यासों को बढ़ावा देना।
- 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन– एक लंबे समय का लक्ष्य जिसका मकसद उत्सर्जन को कार्बन हटाने के साथ संतुलित करना है, जिससे सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
भारत में सौर ऊर्जा में उछाल: 40 गुना से ज्यादा की जबरदस्त बढ़ोतरी
पिछले दस सालों में सौर ऊर्जा क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ा है, जो 2014 में सिर्फ 3जीडब्ल्यू से बढ़कर अक्टूबर 2025 तक 129.92जीडब्ल्यू हो गया है-यह 40 गुना से ज्यादा की जबरदस्त बढ़ोतरी है। इस तेज बढ़ोतरी ने पवन, पनबिजली और बायोमास क्षमता को पीछे छोड़ने के साथ, सौर ऊर्जा को नवीकरण ऊर्जा पोर्टफोलियो में सबसे बड़ा योगदान देने वाला बना दिया है।
सौर ऊर्जा क्षमता में बढ़ोतरी से कुल बिजली मिश्रण में नवीकरण ऊर्जा का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। ये उपलब्धियां निम्न-कार्बन ऊर्जा का बदलाव के लिए भारत के प्रतिबद्धता को दिखाती हैं और एक मजबूत, सतत और सुरक्षित बिजली व्यवस्था बनाने में सौर ऊर्जा की अहम भूमिका को दिखाती हैं।



